ईंट भट्ठों पर हो रही बाल मजदूरी, ना कोई नियम ना कोई कानून

ईंट भट्ठों पर हो रही बाल मजदूरी, ना कोई नियम ना कोई कानून

बाल मजदूरी रोकने के लिए नहीं लगाया कोई सुचना बोर्ड

ना वोट कार्ड, ना आधार, ना राशन, ना कोई जन्म प्रमाण पत्र कैसे मिलेगा लाभ

सापंला, महेश कौशिक। धूल भरी आंधियां, तपती धूप में अध नंगे बदन मिट्टी को देते है ईंटों का आकार, तब जाकर दो वक्त की रोटी नसीब होती है इन मजदूरों को। इन मजदूरों के साथ इनके छोटे बच्चे भी बाल मजदूरी करते है। इन बाल मजदूरों से ये इतना कठिन कार्य करवाने का अपराध बोध न तो भट्ठा मालिकों का है और न ही प्रशासन को। ईंट भट्ठा उद्योग को अपने पसीने से सींच कर मालिक को मालामाल करने वाले इन मजदूरों की सुध लेने का वक्त किसी के पास नहीं है। सरकार के पास तो इन अस्थाई मजदूरों के आंकडे भी नहीं है। इन मजदूरों को सरकार की किसी योजना का फायदा नहीं पहुंच रहा है।

फायदा पहुंचता है तो केवल उनकी गरीबी को दिखाकर मोटी रकम डकारने का जरूर। देश की बडी आबादी को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का लाभ प्राप्त हो रहा है, लेकिन इन मजदूरों की सुध लेने का समय न तो इनके मालिकों के पास है न किसी समाज सेवी संगठन के पास। और सरकारों को तो कभी से रहा ही नहीं है। यदि सरकार को इनकी फिक्र होती तो आज ये इस हालात में कदापि नहीं होते। क्या सरकार को सिर्फ वोट डालने वाले लोगों की चिंता होती है। यदि नहीं, तो ये इस वर्ग के लोगों को लाभ देने में क्या अड़चन होती है। देश प्रदेश की योजनाओं को कौन बनाता है, क्या बनाते वक्त उनको जरा भी ये आभास नहीं रहता है कि जो योजना बनाई जा रही है उसका धरातलीय स्वरूप क्या होगा।

बाल मजदूरी हो, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा हो या अनिवार्य शिक्षा हो, मनरेगा हो या कोई अन्य योजना। इनका धरातल पर क्या हर्ष है, इसकी बानगी समाज के उन अंतिम व वंचित व्यक्तियों से जानी जा सकती है जो किसी ईंट भट्ठों पर या किसी कारखानें में मजदूर कर रहे है। आज जब हमारे सवांददाता ने क्षेत्र के कुछ ईंट भट्ठों का जायजा लिया तो वहां पर स्थिती का मजंर कुछ इस प्रकार था। भारत की आधे से ज्यादा आबादी पसीना पोंछते हुए बाल मजदूरों की है। बालक कल के भविष्य हैं । उन्हें पनपने के लिए, खिलने के लिए सही अवसर देना होगा। बाल मजदूरी के मूल में हमारे समाज की आर्थिक तंगी से जितनी जल्दी हम निपटेंगे उतनी ही जल्दी इस गलत प्रथा का अंत होगा। पेट की ज्वाला उन्हें कल कारखानों में झोंकने पर लाचार करती है,  इसलिए वे बाल मजदूर बन जाते हैं ।

यह भी कड़वा सच है की बहूत से बच्चे पढ़ना चाहते हैं। पर स्कूल कहां हैं, कितने हैं ? बच्चों को जितना जरूरी रोटी और कपड़ा हैं, उतना ही उनके लिए स्कूल भी जरूरी है। खासकर उन जगह में तो स्कूल की जरूरत और ज्यादा है जहां बच्चों को शिक्षा नहीं कारखानें अपनी ओर खींचते है। ज्यादातर भट्ठा मजदूर मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। इन्हें साफ पेयजल, शौचालय, आवास, स्वास्थ्य और बच्चों को शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलती। भट्ठों पर काम करने वाली महिला मजदूरों की स्थित और भी बदतर है। महिला श्रमिकों के लिए शौचालयों की सुविधा नहीं है। महिलाओं को पुरुषों के बराबर मजदूरी भी नहीं दी जाती है। श्रम विभाग, ईपीएफ और जिला प्रशासन के रिकॉर्ड में इन मजदूरों के नाम दर्ज नहीं है। न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जाती है। यहां प्रश्न ये है कि क्या कभी कोई ऐसी योजना बनेगी कि इन सभी लोगों का आधार कार्ड, वोट कार्ड, पहचान कार्ड बनकर इनको इनका हक मिल सके, ताकि ये भी समाज की मुख्य धारा में मिल सके।

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